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प्रदेश मे वन्य जीव संरक्षण सुलगता सवाल , कहीं अवैध शिकार तो कहीं मानव वन्यजीव संघर्ष

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स्वरुप पुरी /सुनील पाल.

ऑक्सीजन डिपो के रूप मे विख्यात उत्तराखण्ड के जंगल अब महफूज व सुरक्षित नहीं है। वन्य जीव संरक्षण व संवर्धन को तैनात जंगलाती खाकी के जवान अब अपना अस्तित्व खोते जा रहे है। हर रोज कोई न कोई ऐसी घटना सामने आती है जो जंगल के रक्षक सिपहसलारो की कार्यप्रणाली पर कई प्रशचिन्ह खड़े कर रही है। बीते कुछ दिनों की बात करे तो पहाड़ो से लेकर मैदानो तक कुछ घटनाए ऐसी घटी है जो जंगल के संरक्षण में तैनात सिस्टम को भीतर ही भीतर खोखला हो जाने का संकेत दे रही है। पौड़ी, हरिद्वार व राजाजी तो हालिया चर्चित केंद्र है, मगर अन्य वन प्रभाग भी इनसे पीछे नहीं है। गुलदारो द्वारा इंसानों को मारे जाने की घटनाए हो या फिर इंसानो द्वारा वन्यजीवो के शिकार व उन्हें काटे जाने के प्रकरण, सच कहे तो बेहद ही डरावना व चिंतित करने वाला विषय है। मगर हर घटित होने वाली घटना के पीछे उच्च अफसरों की बचाव वाली मुद्रा या फिर राजनैतिक दबाव के चलते लापरवाहो को बचाने की चेष्टा भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं है। हरिद्वार प्रकरण मे केवल रेंज अधिकारी को हटाया गया, मगर निचले स्तर के कर्मी बचा लिए गए है। कहीं ऐसा तो नहीं कोई राजनैतिक दबाव ऐसा है जिसके चलते केस को हल्का किया जा रहा है। ऐसे फैसलों से कारवाही करने वाले अफसरों पर दबाव साफ नजर आता है।

प्रदेश के अन्य प्रभाग भी सोसल मीडिया मे बने चर्चा

कमीशनखोरी के लालच मे कई ऐसे बागड़बिल्ले है जो अपने पद का दुरूपयोग कर सरकार की भ्रष्टाचार रोकने की मुहीम को बट्टा लगा रहे है। क्या ऐसे बागड़बिल्लो की प्रदेश को जरूरत है। पहाड़ी छेत्रो की बात करे तो बीते कुछ दिनों पूर्व पहाड़ी जिले के एक अफसर को पब्लिक ने शराबी तक कह दिया। प्रदेश भर के लोग सोसल मीडिया मे इन्हे देख चटकारे लेते रहे। आखिर ऐसा क्यों हुआ, ज़ब उनके छेत्र मे नौ लोग गुलदार की भेंट चढ़ चुके हो तो गुस्सा जायज ही है। वहीं मैदानी छेत्र के एक बड़े रिजर्व मे एक शराबी अफसर की चर्चा अक्सर होती है। यह अफसर अपने को किसी सिंघम से कम नहीं समझता। मगर ज़नाब अपने काम के लिए कम, शाम ढलते ही फ्री की दारु के जुगाड़ के लिए ज्यादा चर्चित है। कभी किसी ने इनकी कायदे से कागजी जांच कर लीं तो इनकी चूले हिलना तय है।

काम करने वाले जवान झेल रहे जिल्लत , लापरवाह कर्मी ले रहे मौज

जंगलाती सिस्टम को बारिकी से देखे तो सैकड़ो की संख्या मे यहां तैनात जवान ऐसे है, जो लड़खड़ा रहे सिस्टम को दिन रात मेहनत कर खड़ा करने का प्रयास कर रहे है। घरबार से दूर रहकर वन्यजीव संरक्षण मे अहम योगदान दे रहे है। मगर इन्ही के बीच कुछ ऐसे भी है जिन्हे वन्यजीव संरक्षन से कोई मतलब नहीं। उन्हें महज अपनी डायरी मेंटेन करने की चंद घंटे ड्यूटी निभानी होती है। ऐसे ही लापरवाही के चलते घटनाए घटती रहती है। उच्च अफसरों को भी अपनी कार्यप्रणाली मे बदलाव लाना होगा। निरंतर गस्त के साथ समय समय पर लापरवाहो के खिलाफ कठोर कार्यवाही करनी होंगी। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो कभी शिकार व कहीं शराब के किस्से चर्चा मे बने रहेंगे। 

 

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